
टोक्यो, जापान।
श्री जगन्नाथ सोसाइटी जापान, हिंदू सेवक संघ जापान और वर्ल्ड संस्कृत स्टडी सेंटर के संयुक्त तत्वावधान स्थापित ” विश्व संस्कृत भाषा अध्ययन एवं शोध संस्थान” एक भव्य कार्यक्रम में संस्कृत भाषा को भविष्य की वैज्ञानिक एवं ज्ञान-भाषा के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक सशक्त आधारशिला जापान में रखी गई।
इस कार्यक्रम का प्रमुख आकर्षण था डॉ डीपी शर्मा का सम्बोधन जिसमें उन्होंने विज्ञान, तकनीक, दर्शन, चिकित्सा और भाषाई वैज्ञानिकता में संस्कृत को अपने तर्कों और संदर्भों से वैश्विक स्तर पर सिंटेक्टिकल, लैक्सिकल एवं सेमेंटिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण भाषा के रूप में सीखने और उसमें छुपे गूढ़ एंक्रिप्शन सूत्रों एवं शाब्दिक विविधता को शोध के माध्यम से समझने और विज्ञान एवं तकनीक के माध्यम से विश्व के सामने लाने पर जोर दिया।
कार्यक्रम में अपने ऑनलाइन संबोधन में इंटरनेशनल डिजिटल डिप्लोमेट, स्वच्छ भारत मिशन के राष्ट्रीय ब्रांड एंबेसडर एवं एवं यूनेस्को से जुड़े लीड ऑथर डॉ शर्मा ने संस्कृत को मात्र प्राचीन भाषा न मानते हुए इसे विज्ञान, दर्शन, गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र तथा रोबोटिक्स के लिए (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) इसकी उपयोगिता को शोध के माध्यम से दुनियां के सामने रखने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गलत संदर्भों से किसी भाषा की उपयोगिता को सत्य साबित नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिए शोध की आवश्यकता है कि जो हम कह रहे हैं वह सच्चाई के धरातल पर सही है या नहीं ।
जापान में आयोजित इस भव्य कार्यक्रम में विभिन्न विशिष्ट अतिथियों और वक्ताओं ने अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई। इस अवसर पर भारत के दूतावास, जापान के प्रतिनिधि ने मुख्य अतिथि के रूप में सभा को संबोधित किया। कार्यक्रम की शुरुआत पंडित मुनींद्र पांडा के उद्घाटन भाषण से हुई, जिसके बाद श्री जगन्नाथ सोसाइटी जापान के श्री ज्ञानेंद्र मोहन मिश्रा ने सभी का स्वागत किया। विशेष वक्ताओं में फिजी में भारत के उच्चायोग के प्रतिनिधि, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, एनसीईआरटी नई दिल्ली के प्रो. जे. एम. मिश्रा, और फिजी विश्वविद्यालय के प्रो. डंबरुधर पति शामिल थे, जिन्होंने अपने विचारों से दर्शकों को लाभान्वित किया। इनके अतिरिक्त, हिंदू स्वयंसेवक संघ, जापान के प्रतिनिधि ने भी अपना संबोधन दिया, जबकि सुश्री साचिको इतो ने ओडिसी नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी।
विशिष्ट अतिथि एवं वक्ता के रूप में आमंत्रित डॉ डी पी शर्मा ने आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए युवा संस्कृत विद्वान डॉ. डमरूधर एवं डॉ मिश्रा की विशेष सराहना की। उन्होंने दोनों विद्वानों का संस्कृत को बढ़ावा देने और मानवता की सबसे पुरानी व गहरी ज्ञान-परंपरा को नए मिशन से जोड़ने की सराहनीय भी की।
डॉ डी पी शर्मा ने कहा कि, “आज हम यहां सिर्फ एक भाषा का जश्न मनाने के लिए नहीं, बल्कि ज्ञान, समझदारी, विज्ञान और संस्कृति की एक समृद्ध सभ्यता का सम्मान करने के लिए इकट्ठा हुए हैं।”उन्होंने संस्कृत को देवभाषा के साथ-साथ गणित, चिकित्सा, खगोलशास्त्र और भाषाविज्ञान की भाषा बताया। आर्यभट्ट, चरक और सुश्रुत जैसे प्राचीन विद्वानों के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संस्कृत ने वैश्विक बौद्धिक इतिहास में अभूतपूर्व योगदान दिया है।
संस्कृत की वैज्ञानिक ताकत पर जोर देते हुए डॉ शर्मा ने पाणिनि द्वारा रचित व्याकरण की तार्किक संरचना की प्रशंसा की। उन्होंने बताया कि आधुनिक कंप्यूटेशनल लिंग्विस्टिक्स, लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स जैसे चैट जीपीटी, जेमिनी, डीप सीक आदि के क्षेत्र में भी संस्कृत पर विशेष शोध की जरूरत है। अगर संस्कृत के लिए विशेष कोई लार्ज लैंग्वेज मॉडल विकसित किया जाए तो यह भाषा विज्ञान के इतिहास में मील का पत्थर साबित होगा।
एक अहम बिंदु साझा करते हुए डॉ डी पी शर्मा ने कहा कि वैदिक गणित में घटाव, गुणा और भाग की अलग-अलग क्रियाएं नहीं होती अर्थात यह केवल योग के माध्यम से की जाती हैं। यह वैदिक मैथमेटिक्स की है संरचना आधुनिक कंप्यूटर आर्किटेक्चर से काफी मिलती-जुलती है, जहां सबट्रेक्शन, डिवीजन और मल्टिप्लिकेशन को बिट शिफ्ट तथा कॉम्प्लिमेंट प्रक्रिया के माध्यम से किया जाता है।
अपनी तार्किक संरचना और व्याकरणिक शुद्धता के कारण यह आधुनिक कंप्यूटर विज्ञान, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के लिए विश्व की सबसे समर्थ भाषा हो सकती है मगर शोध के माध्यम से इसको स्थापित करने की आवश्यकता है।
इस केंद्र पर न केवल संस्कृत भाषा में शोध और शिक्षण प्रदान किया जाएगा, वल्कि ‘स्पोकन संस्कृत क्लास’, सामान्य संस्कृत शिक्षा, और प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अध्ययन पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। शिक्षण के लिए अनुभवी प्रशिक्षकों की नियुक्ति की गई है जो आधुनिक तकनीक और व्यावहारिक सत्रों के माध्यम से छात्रों का मार्गदर्शन करेंगे।
सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पक्ष पर बोलते हुए डॉ डी पी शर्मा ने कहा कि संस्कृत वेद, उपनिषद, भगवद्गीता, योग और दर्शन की अमर परंपरा को संजोए हुए है, जो मानवता को कर्तव्य, करुणा, शांति और भाईचारे का संदेश देती है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जी-20 सम्मेलन में दिए गए ‘एक पृथ्वी, एक सभ्यता, एक परिवार’ वाले संदेश का उदाहरण देते हुए संस्कृत श्लोक “वसुधैव कुटुम्बकम’’ एवं “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः”, की आज की बंटी हुई दुनिया में प्रासंगिकता पर बल दिया।
भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि दोनों देश प्राचीन ज्ञान के संरक्षण और आधुनिक विज्ञान से इसके जुड़ाव के लिए मिलकर काम करें तो यह संबंध और मजबूत होंगे।
कार्यक्रम में युवा पीढ़ी को संस्कृत सीखने, अंतरराष्ट्रीय शोध सहयोग बढ़ाने तथा व्यावहारिक कार्यों को बढ़ावा देने का आह्वान किया गया।
इस केंद्र की स्थापना का मुख्य उद्देश्य संस्कृत के ज्ञान को आधुनिक डिजिटल माध्यमों से वैश्विक स्तर पर पहुँचाना और ‘सा विद्या या विमुक्तये’ (विद्या वही है जो मुक्त करे) के आदर्श वाक्य को चरितार्थ करना है।
जापान की धरती पर यह आयोजन संस्कृत को केवल अतीत की भाषा के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य के ज्ञान, वैश्विक सांस्कृतिक संवाद और बहु-संस्कृति संवाद का जीवंत संसाधन बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
कार्यक्रम का समापन विश्व शांति की कामना के साथ ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के मंत्रोच्चार से हुआ, जो इस केंद्र के वैश्विक और समावेशी दृष्टिकोण को रेखांकित करता है।








